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शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2016

नई सुबह



इठलाती  शाम  चली  है

 गुज़रने   के   लिये

परिंदे  तैयार  हैं  फिर

 बिखरने   के  लिये



आदमी  लगा  है  रात-दिन

 कुछ  न  कुछ  करने  के  लिये

नन्हीं  चिड़िया  सो  गयी  है

सपनों  में  बिचरने  के  लिये



नियति-चक्र  नहीं  बना  है

पलछिन  भी  ठहरने  के लिये

दुनिया  ने  इंतज़ाम  किये  हैं

 सन्नाटा  पसरने  के  लिये



सुमन  से  आज़ाद  है  सुगंध

हवाओं  में  बिखरने  के लिये

हम आज  बेक़रार  हैं  क्यों

भाव  रिश्तों  का परखने  के लिये 



नई  सुबह  का  इंतज़ार  है

जब  कुछ  न  हो  अखरने  के  लिये

प्यास  बुझ  जायेगी  अब

आई  है  बदली  बरसने  के  लिये